गांधीजी (Mahatma Gandhi) के चार बेटे थे. इन चारों में एक सबसे बड़े हरिलाल (Harilal Gandhi) ने तो पिता से इस कदर विद्रोह किया कि जीवनभर वो सब करते रहे, जिससे पिता को कष्ट पहुंचे. बाकी बचे तीन बेटों में एक को गांधीजी बहुत पसंद करते थे, क्योंकि वो उनका आज्ञापालक था लेकिन उनका एक बेटा ऐसा भी था, जो उनकी परछाई से निकलकर अपनी खुद की जगह बना सका. अगर पेशेवर तौर पर सफलता को पैमाना मानें तो वो उनका सबसे काबिल बेटा कहा जाएगा.
गांधीजी के चार बेटों (Gandhi's son) में दो भारत में पैदा हुए थे जबकि छोटे दोनों बेटे दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में पैदा हुए. दोनों बड़े बेटे यानि हरिलाल और मणिलाल (Manilal) हमेशा इस बात पर क्षुब्ध रहते थे कि गांधीजी ने उन्हें स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई नहीं करने दी. अगर उन्हें पिता ने पढ़ाई कराई होती तो उनका अपना एक करियर होता. वो पिता की बरगद सरीखी छाया से निकलकर अपनी कोई पहचान बना सकते थे.
हरिलाल पहले ही पिता से विद्रोह करके 1911 में उनसे संबंध तोड़कर दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए थे. पिता के प्रति नाराजगी और अलग जिंदगी जीने की इच्छा नंबर दो बेटे मणिलाल में भी उठती रहती थी. हालांकि वो कभी उसे लेकर मुखऱ नहीं हुए.
मणिलाल तब पिता के साथ 1915 में भारत भी आए, जब गांधीजी पूरी तरह से दक्षिण अफ्रीका छोड़कर भारत आ गए थे. लेकिन डेढ़-दो साल ही यहां पिता के साथ रहने के बाद उन्हें हालात कुछ लगे कि वो साथ में रह नहीं पाएंगे. उन्हें अपनी स्वतंत्रता चाहिए थी. वो दो साल बाद ही वापस दक्षिण अफ्रीका चले गए.
मणिलाल ने पिता से दूर रहने का फैसला किया
उन्होंने डरबन (Durban) में गांधीजी के फिनिक्स आश्रम को संभालने के साथ वहां के प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक समाचार पत्र इंडियन ओपिनियन (Indian opinion) का संपादन शुरू किया. 1956 में अपने निधन तक वो यही करते रहे. उन्होंने पिता से दूर दक्षिण अफ्रीका में ही बसने का फैसला कर लिया.
मणिलाल ने पिता के साथ रहना पसंद नहीं किया, इसलिए वो हमेशा के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए
मणि के बारे में कहा जाता है कि वो एक मुस्लिम लड़की से प्यार करते थे, उससे शादी करना चाहते थे लेकिन इसके लिए ना तो गांधीजी की अनुमति मिली और ना ही कस्तूरबा. बाद में उन्होंने गांधीजी की पसंद की एक लड़की से शादी की. इस पूरे वाकये पर दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ केप की सीनियर हिस्ट्री फैकल्टी उमा धूपेलिया मिस्त्री (गांधीजी की पड़पोती) ने विस्तार से लिखा है.