गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 भारतीय संविधान के पहले का संविधान है। इस एक्ट के सेक्शन 311 में भारत की परिभाषा लिखी है। उसमें लिखा है कि ब्रिटिश इंडिया इन्क्लूडिंग प्रिंसली स्टेट्स यानी भारत जो है, वह ब्रिटिश इंडिया और प्रिंसली स्टेट्स को मिलाकर है। मतलब यह कि जब पासपोर्ट बनता था तो आपको ब्रिटिश इंडिया से लेना पड़ता था, भले ही आप किसी रियासत के राजा क्यों न हो।
मतलब यह कि जब अंग्रेज यहां से जा रहे थे तो वे भारत छोड़कर जा रहे थे, किसी रियासत को नहीं। स्वाभाविक ही ये सभी रियासतें मिलाकर भारत ही थीं। जब रियासतें भारत में ही थीं तो विलय का कोई मतलब ही नहीं बनता। जब भारत से रियासतें बाहर हैं ही नहीं तो कैसा विलय? लेकिन फिर भी विलय का प्रारूप बनाया गया,क्योंकि भारत के दो टूकड़े किए जा रहे थे। एक का नाम पाकिस्तान और दूसरे का नाम हिंदुस्तान हुआ। ऐसे में विलय पत्र जरूरी था।
प्रारूप बनाकर 25 जुलाई 1947 को माउंटबेटन की अध्यक्षता में सभी रियासतों को बुलाया गया। इन सभी रियासतों को बताया गया कि आपको अपना विलय करना है। वह हिन्दुस्तान में करें या पाकिस्तान में, यह आपका निर्णय है। जाहिर सी बात थी कि माउंटबेटन के प्लान में किसी भी राज्य को स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं था। उसे दो में से किसी एक देश को चुनना था। उस विलय पत्र को सभा में बांट दिया गया।
यह विलय पत्र सभी रियासतों के लिए एक ही फॉर्मेट में बनाया गया था जिसमें कुछ भी लिखना या काटना संभव नहीं था। बस उस पर रियासतों के प्रमुख राजा या नवाब को अपने नाम पता, देश का नाम और सील लगाकर उस पर दस्तखत करके इसे गवर्नर को देना था और गवर्नर को यह निर्णय लेना था कि कौन सा राजा किस देश के साथ रह सकता है?
26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरिसिंह ने अपनी रियासत के भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तखत किए थे। गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। न इसमें कोई शर्त शुमार थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग। इस वैधानिक दस्तावेज पर दस्तखत होते ही समूचा जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया।
इसके बाद संविधान बनना शुरू हुआ। पहले प्रांत का, फिर सेंटर और फिर रियासतों का। संविधान सभा में जब प्रिंसली स्टेट्स को यह कहा गया कि आप स्थानीय आधार पर अपने संविधान बना लीजिए, क्योंकि केंद्र में संविधान बन रहा है और बाद में हम उसमें यह जोड़ देंगे। ऐसे में वहां के राजाओं ने अपने हितों को ध्यान में रखकर संविधान बनाना प्रारंभ कर दिया जिसके चलते दिक्कतें आने लगीं। ऐसे में बीएम राव और बाद में एमके वेलोडी कमेटी बनाई गई। इस कमेटी ने यह निर्णय लिया कि अब ये रियासतों के संविधान होंगे। बाद में रियासतों के कानून को संविधान में जोड़ दिया गया।
बाद में सरदार पटेल ने कहा कि प्रिंसली स्टेट्स और प्रोविजंस कोई अलग नहीं है इसलिए हम इसमें फर्क नहीं चाहते हैं। हम चाहते हैं कि दोनों के कानून एक ही समान हों। तब संविधान सभा ने रियासत और राज्य दोनों के ही कानून को मिलाकर एक ही प्रकार के कानून अटैच किए और उन्हें फिर से सभी रियासतों को भेजा गया गया। सभी राजाओं से इस पर विचार किया और इसे अपनी मंजूरी दे दी।
इन स्टेट के संविधान में सभी राजाओं ने लिखा कि मैं, मेरे वंशज और मेरे बाद जो मेरा उत्तराधिकारी और राज्य में आने वाला, शासन करने वाला कोई भी व्यक्ति और यहां की प्रजा, वो सभी भारत के संविधान को एडाप्ट करते हैं और भारत का संविधान यहां लागू होता है। मतलब यह कि अब राजा है तो संविधान के द्वारा राजा है। अगर संविधान उसे राजा नहीं बताता तो वह राजा नहीं है इसलिए अब भारतीय लोकतंत्र में राजा और प्रजा नहीं रहे, प्रजा ही राजा है।
तब 25 नवंबर 1949 को इसे भारत ने अपनाया। लेकिन इसके पहले 17 अक्टूबर 1949 को एक एक ऐसी घटना घटी जिसने जम्मू और कश्मीर का इतिहास बदल दिया। दरअसल, संसद में गोपाल स्वामी अयंगार ने खड़े होकर कहा कि हम जम्मू और कश्मीर को नया आर्टिकल देना चाहते हैं। उनसे जब यह पूछा गया कि क्यों? तो उन्होंने कहा कि आधे कश्मीर पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है और इस राज्य के साथ समस्याएं हैं। आधे लोग उधर फंसे हुए हैं और आधे इधर तो अभी वहां की स्थिति अन्य राज्यों की अपेक्षा अलग है तो ऐसे में वहां के लिए फिलहाल नए आर्टिकल की जरूरत होगी, क्योंकि अभी जम्मू और कश्मीर में पूरा संविधान लागू करना संभव नहीं होगा। अतत: अस्थायी तौर पर उसके लिए 370 लागू करना होगी। जब वहां हालात सामान्य हो जाएंगे तब इस धारा को भी हटा दिया जाएगा। फिलहाल वहां धारा 370 से काम चलाया जा सकता है।
उल्लेखनीय है कि सबसे कम समय में डिबेट के बाद यह आर्टिकल पार्लियामेंट में पास हो गया। यह संविधान में सबसे आखिरी में जोड़ी गई धारा थी। इस धारा के फेस पर भी लिखा है कि 'टेम्परेरी प्रोविंजन फॉर द स्टेट ऑफ द जम्मू और कश्मीर'।
भारतीय संविधान के 21वें भाग का 370 एक अनुच्छेद है। 21वें भाग को बनाया ही गया अस्थायी प्रावधानों के लिए था जिसे कि बाद में हटाया जा सके। इस धारा के 3 खंड हैं। इसके तीसरे खंड में लिखा है कि भारत का राष्ट्रपति जम्मू और कश्मीर की संविधान सभा के परामर्श से धारा 370 कभी भी खत्म कर सकता है। हालांकि अब तो संविधान सभा रही नहीं, ऐसे में राष्ट्रपति को किसी से परामर्श लेने की जरूरत नहीं।
जब कोई आर्टिकल या धारा टेम्परेरी बनाई जाती है तो उसको सीज करने या हटाने की प्रक्रिया भी लिखी जाती है। उसमें लिखा गया कि प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया जब उचित समझें और उन्हें लगे कि समस्याओं का हल हो गया है या जनजीवन सामान्य हो गया तो वह उस धारा को हटा सकता है।
यहां यह समझने वाली बात यह है कि धारा 370 भारत की संसद लेकर आई है और वहीं इसे हटा सकती है। इस धारा को कोई जम्मू और कश्मीर की विधानसभा या वहां का राजा नहीं लेकर आया, जो हटा नहीं सकते हैं। यह धारा इसलिए लाई गई थी, क्योंकि तब वहां युद्ध जैसे हालात थे और उधर (पीओके) की जनता इधर पलायन करके आ रही थी। ऐसे में वहां भारत के संपूर्ण संविधान को लागू करना शायद नेहरू ने उचित नहीं समझा या नेहरू ने इस संबंध में शेख अब्दुल्ला की बात मानी हो।
लेकिन यह भी कहा गया कि इसी बीच वहां पर भारत के संविधान का वह कानून लागू होगा जिस पर फिलहाल वहां कोई समस्या या विवाद नहीं है। बाद में धीरे-धीरे वहां भारत के संविधान के अन्य कानून लागू कर दिए जाएंगे। इस प्रक्रिया में सबसे पहले 1952 में नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच एक एग्रीमेंट हुआ। जिसे 'दिल्ली एग्रीमेंट' कहा गया।