1954 में प्रेसीडेंट ऑफ इंडिया की ओर से एक आदेश पारित किया गया। उस आदेश के तहत जम्मू और कश्मीर राज्य में भारतीय संविधान के अन्य प्रावधान लागू किए जाने थे लेकिन उन्होंने अलग से राज्य को एक कानूनी आदेश दे दिया। ऐसा आदेश, जो कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ था। दरअसल, किसी राष्ट्रपति को संविधान में कोई धारा जोड़ना या नया कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
लेकिन ऐसा कहते हैं कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने नेहरू के कहने पर राज्य को विशेष अधिकार देने के लिए एक आदेश पारित कर दिया। यह विशेष अधिकार ही आर्टिकल 35A था। यह ऐसा आर्टिकल है जिसको राष्ट्रपति को बनाने का अधिकार ही नहीं था। राष्ट्रपति के अधिकार में यह था कि जम्मू और कश्मीर राज्य में भारत के संविधान के बचे हुए प्रावधानों को लागू किया जाए। लेकिन राष्ट्रपति ने संविधान के प्रावधानों को लागू करने के बजाय एक नया आर्टिकल बना दिया आर्टिकल 35A जिसे कि देश का सबसे बड़ा 'संवैधानिक फ्रॉड' माना गया।
14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस आदेश के जरिए भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया। इस आर्टिकल 35A में लिखा है कि जम्मू और कश्मीर विधानमंडल को यह अधिकार प्रदान करता है कि संविधान जम्मू और कश्मीर को राज्य के रूप में विशेष अधिकार देता है।
इसके तहत दिए गए अधिकार 'स्थायी निवासियों' से जुड़े हुए हैं। इसका मतलब है कि राज्य सरकार को ये अधिकार है कि वे आजादी के वक्त दूसरी जगहों से आए शरणार्थियों और अन्य भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर में किसी तरह की सहूलियतें दें अथवा नहीं दें।
यह उल्लेखनीय है कि यह आर्टिकल न तो पीएम नेहरू ने कैबिनेट ने पास कराया और न ही इसका संविधान में कोई उल्लेख ही था। फिर भी यह आर्टिकल बाद में संविधान में जोड़ दिया गया
आर्टिकल 35A में लिखा है कि राज्य...
1. यह तय करे कि जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी कौन है?
2. किसे सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में विशेष आरक्षण दिया जाएगा?
3. किसे संपत्ति खरीदने का अधिकार होगा?
4. किसे जम्मू और कश्मीर विधानसभा चुनाव में वोट डालने का अधिकार होगा?
5. छात्रवृत्ति तथा अन्य सार्वजनिक सहायता और किसे सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों का लाभ किसे मिलेगा?
जब राज्य को ये अधिकार दे दिए गए तो फिर जम्मू और कश्मीर में राजनीतिज्ञों को अपनी मनमानी करने का एक हथियार मिल गया। इस आधार पर उन्होंने तब राज्य का अपना संविधान बना लिया। इसमें कहा गया कि...
1. जम्मू-कश्मीर का स्थायी नागरिक वह व्यक्ति है, जो 14 मई 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के 10 वर्षों से राज्य में रह रहा हो, साथ ही उसने वहां संपत्ति हासिल की हो।
2. भारत के किसी अन्य राज्य का निवासी जम्मू और कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं बन सकता है और इसी कारण वो वहां वोट नहीं डाल सकता है।
3. राज्य किसी गैरकश्मीरी व्यक्ति को कश्मीर में जमीन खरीदने से रोकता है।
3. अगर जम्मू और कश्मीर की कोई लड़की किसी बाहर के लड़के से शादी कर लेती है तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाते हैं, साथ ही उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं।
4. राज्य सरकार किसी कानून को अपने हिसाब से बदलती है तो उसे किसी भी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
5. कोई भी बाहरी व्यक्ति राज्य में व्यापारिक संस्थान नहीं खोल सकता है।
इस कानून की आड़ में राज्य सरकार ने देश के विभाजन के वक्त बड़ी तादाद में पाकिस्तान से आए शरणाथियों में मुसलमानों को तो जम्मू और कश्मीर की नागरिकता दे दी लेकिन हिन्दू और सिखों को इससे वंचित रखा। इसके अलावा जम्मू और कश्मीर में विवाह कर बसने वालीं महिलाओं और अन्य भारतीय नागरिकों के साथ भी जम्मू और कश्मीर सरकार अनुच्छेद 35A की आड़ लेकर भेदभाव करती है। यदि कोई मुसलमान किसी बाहरी लड़की से विवाह कर लेता है तो उसने वहां का नागरिक मान लिया जाता है लेकिन जब कोई हिन्दू ऐसा करता है तो उसे वहां का नागरिक नहीं माना जाता।
1989 तक राज्य में स्थिति शांत रही। राज्य में विकास की गति तेज हो चली थी। वहां का पर्यटन भी अपने चरम पर था। लेकिन फिर 1990 से कश्मीर घाटी में शुरू हुआ हिन्दुओं का कत्लेआम करना...! और राज्य की स्थिति बदल गई। तब से अब तक इस राज्य को वहां के कट्टरपंथियों और राजनीतिज्ञों ने इसे फिर से एक विवादित और अशांत स्थान बना रखा है, क्योंकि वे चाहते हैं कि राज्य इसी तरह अशांत रहे ताकि वहां कभी भी 35A और धारा 370 नहीं हटाई जा सके।
अतत: यह माना जाता है कि भारत की संसद, राज्यसभा और राष्ट्रपति मिलकर धारा 370 और आर्टिकल 35A को हटाने की शक्ति रखते हैं।